Friday, November 27, 2020

The Catamount Reboot with No profit No Loss started to do "Goal" : The Never Ending Journey

 The Catamount Reboot- Stylemaar has been turned on to do goal in the business Olympic. Before its second launch in the market, Market size has become double in the comparison of 2017 and the growth rate increased more than before. 


Recent Acquisitions: 
Foodie Holic Startup, Founder - RajShekhar (Strategic Value 5000 dollars that is to be spent in the coming years. 






Tuesday, January 10, 2017

स्टाइलमार की तड़प खत्म हुई अब पांच साल बाद The Next Conglomerate is The Catamount Reboot - Ab Style Maarega India- Never Ending Journery

दिल की गहराई से निकले शब्दों में कहूं तो स्टार्टअप एक बिजनेस है और बिजनेस तड़प और जुनून का दूसरा नाम है। कल्पना कीजिए... गलते हुए नासूर, बहती हुई पीप और दर्द से मचलते हुए शरीर से करहाने की आवाज़ें। लेकिन दूर तक कोई सुनने वाला ना हो सिर्फ आप और आपका विश्वास ही आपके साथ हो। और अगर जुनून बाकी है तो वो विश्वास को तब तक खोने नहीं देगा जब तक आप एक यादगार सफल अंजाम तक न पहुंच जाएं।

ठीक इसी तरह एक जुनून को थामे एक साल चार महीनें की यादगार सफल यात्रा तय की है Stylemaar ने। एक ऐसी फुटवियर ब्रैंड स्टार्टअप जो घर के एक कमरे में बैठे हुए 1 सितंबर 2015 को मैंने और मेरे सीनियर पार्टनर ने शुरू की। मैं और सीनियर पार्टनर नौकरी छोड़कर आ गए लेकिन इनवेस्टर से कैसे फंड लिया जाता है, कैसे बात करनी है, कैसे होगा पैसों का इंतजाम कुछ नहीं पता था। दोनों ने अपने - अपने अकाउंट खाली कर दिए लेकिन शुरू करके ही माने।

 शुरूआती डेढ़ महीनें में करीब 1 लाख रुपए सेल तो करली थी पर तीसरे महीनें सारी हवा निकल गई। मतलब निराशा हुई लेकिन आत्मविश्वास और उम्मीद कम नहीं हुई थी। सेल कैसे हो कैसे आगे बढ़ा जाए इसी आस में  Stylemaar घर के 10 बाय 10 के कमरे से निकल कर 25 दिसंबर 2015 को दिल्ली की एक मशहूर मार्केट में  10 बाय 10 के कमरे के ऑफिस तक  पहुंच चुका था। लेकिन 20 हजार से ऊपर महीने की सेल नहीं दे पा रहे थे। बचा हुआ फंड खत्म होने वाला था। मार्च आया, होली निकल गई लेकिन हमारी दिवाली आने का नाम नहीं ले रही थी। फंड इतना ही बचा था कि रेंट के ऑफिस में दो महीना ही टिका जा सकता था। मई आ गया। इसी महीने में आत्मविश्वास को झटका लगा था। यही वो वक्त था। रिसर्च काम आनी थी। हमने मिलकर जो रिसर्च की उसके नतीजे को देखकर 10 बाय 10 के कमरे को ब्रैंड स्टोर बना दिया। लेकिन तब तक फंड काफी खर्च हो चुका था। इतना फंड नहीं था कि स्टोर में बुलाकर कस्टुमर को बेच सकें। इसलिए स्टोर के बाहर केनओपी लगाई और कस्टुमर को "Stylemaar" फुटवियर के बारे में ब्रीफ करते हुए माल सेल करना शुरू किया, उपभोक्ताओं से ज्यादा से ज्यदा कम्यूनिकेट किया। देखते ही देखते मेला सा लगने लगा। सेल बढ़ने लगी। एक माह में ही अॉफिस ने स्टोर की शक्ल लेली। इस तरह "Stylemaar" फुटवियर स्टार्टअप ने एक बिजनेस का रूप लिया और फिर उपभोक्ताओं के दिलों में जगह बनाई। इस बार हमारी दिवाली आई। करीबन 2 लाख प्रति माह  के सेल टारगेट पर पहुंचा। इस बार हमने नहीं बल्कि उपभोक्ताओं ने टारगेट अचीव किया था।

"Stylemaar" एक रिसर्च बेस्ड कॉंसेप्ट है जो रिसर्च कहती है कि देश के बाजार में 70 प्रतिशत बायर (खरीदार) मिडिल क्लास और लोअर मिडिल क्लास तबके से आते हैं और इनके पास बहुत ज्यादा महंगी वस्तुएं खरीदने के लिए पर्चेसिंग पावर (Purchasing Power) नहीं होती इसलिए सस्ती लेकिन टिकाऊ वस्तुएं सबसे ज्यादा बार बार यही लोग खरीदते हैं। फुटवियर  के क्षेत्र में देखा जाए तो नामी ब्रैंड का सुंदर, सस्ता, टिकाऊ जूता या चप्पल लेने जाने पर एक झटके में कम से कम 2000 ठंडे हो जाते हैं। इसलिए मजबूरन देश के 70 प्रतिशत बायर को कई बार Reebok की जगह पर Reeboke और Adidas की जगह Abibas से काम चलाना पड़ता है।

वहीं रिसर्च का दूसरा पहलू ये भी है कि ई-कॉमर्स आगे जरूर है और बढ़ रहा है लेकिन फुटवियर को अॉनलाइन सेल कर पाना देश के ई-कॉमर्स बाजार के लिए सबसे बड़ी चुनौती है। साइज, कलर और कम्फर्ट लेवल को देखते हुए फुटवियर की खरीद ऑनलाइन प्लेटफॉर्मों से महज 8 प्रतिशत ही होती है बाकी 92 फीसदी फुटवियर खरीदारी रीटेल बाजार से होती है। इसके अलावा भारत चीन के बाद फुटवियर की दूसरी सबसे बड़ी मार्केट है।  वर्मातमान में फुटवियर मार्केट 25 हजार करोड़ की है और अनुमान है कि भारत का फुटवियर बाजार 25 हजार करोड़ से बढ़कर 2021 तक 50 हजार करोड़ का हो सकता है।

 "Stylemaar" तर्क में तो पहले ही आगे हो गया था और जिस तेजी से ये उपभोक्ताओं के दिलों की पसंद बन रहा है उसे देखने के बाद भविष्य में मैं ये देखना चाहता हूं कि कुछ सालों में ये देश के बड़े ब्रैंड्स के खिलाफ चुनौती के मैदान में बल्लेबाजी करेगा।
"Stylemaar" को बहुत दूर तक का सफर तय करना है चाहे मैं अब साथ हूं या नहीं। मैं "Stylemaar" को ऐसी स्टेज पर छोड़ रहा हूं जिसको एक लाइन परिभाषित किया जा सकता है कि "Above Failure and Near To Success"
जिन हाथों में इसे सौंपा है उन पर विश्वास है कि अगली बार दूर से ऊंचाइयों की ओर देखूं तो "Stylemaar" के लिए ये लाइन सिमटकर एक शब्द रह जाएगी- "Successful"

इस यात्रा में "Stylemaar" को आगे बढ़ाने की कोशिशों में  मैंने एक उम्मीद छोड़ी थी जिसको बड़े भाई अंकित और कुछ दुश्मनों ने तबाह करने की कोशिश की लेकिन आज फिर 3 साल बाद मैंने दूसरा जन्म लिया है।

बचपन से इंजीनियर हूं, साइंटिस्ट की तरह सोचता हूं, अब हर साल दिवाली आएगी स्टाइलमार- द कैटामाउंट रीबूट - द नेवर एंडिंग जर्नी बन चुकी है। 

माई प्रीवियस इंपलोइज- 
शेख सोहेल, फिरोज अहमद सिद्दिकी, परमवीर सिंह, सलतनत प्लाजा शोपकीपर ओखला मार्केट, प्रणव शर्मा, मोनू कुमार इंटर्न, विक्की शर्मा, अभिशेक चोटाला सीए इंटर्न,  <फ्रांचाइस इंडिया- वाइस प्रसीडेंट वंदना एंड रवि (IIM Ahmdabad) hired in 1 lac>, Consultant - Akash Tyagi, Rashi, Graphic Design printing Solution Owner. प्रशांत झां इंटर्न डवलपर, <मोहम्मद फैजान वेब डवलपर on 58 thousand>, Amit Panday- Freelancer


Business Retail corporate partners 

Wonderchef - Sanjeev Kapoor
Singer
Philips
Cello
Zummo Span
Optima Watches
Fuji film
Videocon mobile
etc. 
--
Clients: 
Bestech Real Estate and Hotel etc. 

Market size of Stylemaar till 2017 June Month - Lajpatnagar, Bhogal, Jangpura, Ashram, Maharani bagh, Okhla, Bangalore, Mumbai, Rajasthan, Gujurat, Hariyana. (South Delhi - Total Unique customers traditional - 3000)

Benefit for customers: Low-cost brand with replacement guarantee on Bill. 


Previous Valuation of Stylemaar - 24 Lacs INR
The current Valuation of Stylemaar The Catamount Reboot is 88 Trillion Dollars. 
Current Situation: No profit No Loss. 

Current Employees: 
Aditya Birla group - Free

Aditi Pathak

 Free
Total Active Girls on online platforms Free 


प्रीवियस एंजल इनवेस्टर्स : 
HBD, Anil Kumar Amrohi, Rajsheker Sriker, Nirmala Rana

Amount Invested: Seed Fund
Nirmala Rana - 2 Lacs
Anil Kumar Amrohi- 2 Lacs+HDFC - 1 Lacs+Rajshekher > 40000 + Emergency Fund 30000+30000+ 7% Interest Profit. 

Sales Average Turnover After Demononitisaion: 24 Lacs 

No Profit/No Loss (Net Profit)

Founder - Neel Kumar Rana (Anil Kumar Amrohi) 

Saturday, May 30, 2015

मैं नीर भरी दु:ख की बदली....

जमाना बदला, मिज़ाज में परिवर्तन आया। साहित्य का क्षेत्र भी इस बदलाव के दौर से अछूता नहीं रहा। पहले कविता समझने के लिए अपने आपको ढाला जाता था तो अब कविताएं लोगों को आसानी से समझाने के रची जाने लगी हैं। मंचीय कवि कविताओं में सरल, रोचक और समझने लायक ही शब्दों का प्रयोग कर रहे हैं। ऐसा ज्यादातर मंचीय कवियों की कविताओं में देखने को मिलता है। वर्तमान में आयोजित किए जा रहे मंचीय कविता पाठ के विषय के इर्द-गिर्द घूमते सवालों का जवाब दे रही हैं मशहूर कवयित्री डॉ. सरिता शर्मा। प्रस्तुत हैं डॉ. सरिता शर्मा से अनिल कुमार की खास बातचीत के अंशः

कवि सम्मेलनों में क्या बदलाव आया है? 

-बदलाव आया है। मंचीय कविता पाठ ज्याद पॉपुलर हुए हैं। यहां गुनगुनाना पढ़ता है। मंच की कविता और अन्य कविता में यही अंतर है कि मंच पर कही जाने वाली ग़ज़लें और कविताओं की शब्दावली बहुत सरल और आसान होती है। यह खासकर श्रोतोओं को ध्यान में रखकर ही कही जाती हैं। मैंने कहीं तरन्नुम नहीं सीखा लेकिन गुनगुनाना जैसे मानों समय की मांग थी। मंच पर जाती गई और गुनगुनाने लगी। 

क्या कवि सम्मेलनों का व्यवसायीकरण हो गया है? 

-हां हुआ है काफी हद तक। मंचीय कविता पाठ का व्यवसायिकरण हो जाने का उदाहरण है कि मंच पर कविता पाठ के लिए नए कवियों की जमात सी खड़ी हो गई है। कविता के साथ रात काली कोई नहीं करना चाहता लेकिन रातों-रात मशहूर होने के लिए मंच पर जल्द से जल्द आना चाहते हैं। मेरे पास कई ऐसे कवि बनने की चाह लेकर आते हैं जो एक दिन कविता लिखने की कला सीखते हैं, दूसरे दिन सीखते हैं और तीसरे दिन मंच पर चढ़ना चाहते हैं। 

ऐसे में, क्या कविताओं में भाषा का स्तर गिरा है?

-हां बिलकुल। वो..कहते हैं ना... कि खोटे सिक्के जब बाजार में चलने लग जाएं तो खरे सिक्कों का महत्व अपने आप ही घट जाता है। तात्पर्य यह है कि मंच पर पढ़ी जाने वाली कविताओं में फूहड़पन ज्यादा आ गया है। हास्य कविताओं में फूहड़ता ही नजर आती है। यह सिलसिला यूं हीं शुरू नहीं हुआ। क्योंकि अगर इस विशेष व्यंजन का स्वाद भी श्रोताओं को चखाने वालों ने चखाया है। अब तो हालत यह है कि कई श्रोताओं को फूहड़ता में ही आनंद आने लगा है। 

अच्छे कवि अपने आपको कैसे बनाए रख रहे हैं?

-मैं, अपनी बात करूं तो मैं इस दौर में इस फूहड़ता से अपने आपको दूर रखकर एक मंचीय कवयित्री के रूप में अपने आपको स्थापित कर पाई हूं। उसकी वजह मेरे आदर्श, सच्चाई और ईमानदारी है। 

एक अच्छा कवि होने के लिए कुछ विशेष क्षमताओं का होना जरूरी है? 

अगर आप अपने लिखे की आलोचना करना जानते हैं और आलोचना करने के बाद उसे खारिज करने की क्षमता रखते हैं तो आप एक अच्छी कविता रचने में कामयाब हो सकते हैं।

  क्या कवि खुद अन्य कवि की कविताएं भी पढ़ते हैं?

कवि पर निर्भर करता है। वो क्या पढ़ना चाहता है। मैने ऐसे लोग भी देखे हैं जो कवि अन्य कवि की कविताएं नहीं पढ़ते। लेकिन जहां तक मैं अपनी बात करूं त मैं अकसर मेरे पसंदीदा चयनित कवियों की कविताएं पढ़ा करती हूं। 

आपकी लिखी हुई किन पंक्तियों ने आपको सबसे ज्यादा हैं? 

-मेरी कुछ पंक्तियां हैं जो मुझे प्रभावित करती हैं। यह पंक्तियां कुछ हैः
“मुझसे मिलकर कोई मेरी बेखुदी से डर गया
वो अंधेरे में जिया था रोशनी से डर गया
उसके ज़हनों-दिल पे काबिज थी हवस की आंधियां
पास आया तो मेरी पाक़ीज़गी से डर गया”

अन्य कवि या कवयित्री की किन पंक्तियों ने आपको प्रेरित किया? 

मुझे महादेवी वर्मा की कविताओं ने बहुत प्रभावित किया है। उनकी कुछ पंक्तियां अकसर गुनगुनाया करती हूं।
‘मैं नीर भरी दुख की बदली
परिचय इतना इतिहास यही
उमड़ी कल थी मिट आज चली……
इन पंक्तियों की शुरूआत कुछ ऐसे होती है..
“मैं नीर भरी दु:ख की बदली!
स्पंदन में चिर निस्पंद बसा,
क्रन्दन में आहत विश्व हंसा,
नयनों में दीपक से जलते,
पलकों में निर्झरिणी मचली!”
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“अगर आप अपने लिखे की आलोचना करना जानते हैं
और आलोचना करने के बाद
उसे खारिज करने की क्षमता रखते हैं
तो आप एक अच्छी कविता रचने में कामयाब हो सकते हैं”
- डॉ. सरिता शर्मा

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परिचय
शिक्षाः स्नातकोत्तर (हिंदी साहित्य), पीएचडी
प्रकाशित कृतियाः ‘हो गई गूंगी व्यथाएं’ (अनुगीत संग्रह), ‘पीर के सातों समंदर’ (गीत संग्रह), ‘नदी गुनगुनाती रही’ (गीत संग्रह), ‘तेरी मीरा जरूर हो जाऊं’ (मुक्तक-छंद संग्रह), ‘गीत नन्हे मुन्नों के’ (बाल गीत संग्रह), ‘चांद, मोहब्बत और मैं’ (ग़ज़ल संग्रह), ‘चांद सोता रहा’ (ऑडियो एलबम)
काव्य यात्राएः गणतंत्र दिवस के अवसर पर लालकिले पर आयोजित होने वाले प्रतिष्ठित राष्ट्रीय कवि सम्मेलन में 11 बार सहभागिता सहित देश-विदेश में अनवरत काव्य यात्राएं। सम्मान एवं उपलब्धियां: ‘ब्रज कोकिला’ उपाधि- मथुरा, ‘महादेवी वर्मा पुरस्कार’ महादेवी वर्मा न्यास- फर्रुखाबाद; ‘छत्तीसगढ़ निधि’ उपाधि- भिलाई नगर, छत्तीसगढ़;  ‘सुमन’ सम्मान- उन्नाव; ‘नर्मदा’ सम्मान- खरगौन मध्य प्रदेश। 

Wednesday, April 22, 2015

किसान व्यथाः उम्मीद और हौसले का कत्ल!


Credit- www.4to40.com

'किसान'

आग सी बरसती धूप में पसीने से लथपथ,
खेत जोतता है तू
खून जमा देने वाली ठंड में भी,
खेत को सींचता है तू,
दूर शहर में बैठे शहरवासियों का भी,
पेट भरता है तू,
दिन खेत पर गुजरता है,
रात सुबह के इंतजार में,
रंग लाएगी, एक दिन, 
रंग लाएगी.......
लहलहाती फसल
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Note: First broadcasted by DD National 

Monday, March 30, 2015

बदलते दौर में दलित बनती 'हिंदी'



ग्लोबलाइजेशन के दौर में भारतीय समाज कितना बदल गया है इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि वह खुद की भाषा पर तवज्जों देना ही भूलता जा रहा है। कुछ अंग्रेजी तो कुछ सोशल मीडिया और तेजी से बदल रही रूचियों के कारण हिंदी साहित्य एक पिछड़ रहे दलित की तरह है। हिंदी के पिछड़ेपन, साहित्य के घटते महत्व तथा बोलने-लिखने की आजादी को लेकर लेखक व वरिष्ठ पत्रकार शरद दत्त से संक्षिप्त बातचीतः




साहित्य से युवा, क्यों दूर हो रहा है, इसकी क्या वजह हैं?
युवा, हिंदी और अंग्रेजी दोनों साहित्य से दूर हो रहा है। लेकिन इस कशमकश में हिंदी साहित्य ज्यादा ही कुछ पिछड़ रहा है। इसकी वजह दो हो सकती हैं एक तो हम साहित्य की किताबों के लिए अच्छी कीमत का निर्धारण नहीं कर पा रहे हैं। आप ही बताइए अगर अच्छा साहित्य बाजार में ऊंचे दामों पर बिकेगा तो युवा कैसे उसे खरीदेगा।
इसकी दूसरी यह भी वजह है कि अब पब्लिक लाइब्रेरियों के प्रचार-प्रसार और उनसे युवाओं को जोड़ने के अभियानों में कमी आई है। पहले पब्लिक लाइब्रेरियां पढ़ने वालों की संख्या से भरीं रहती थीं लेकिन आज पब्लिक लाइब्रेरियों में सन्नाटा पसरा रहता है। पिछले 20 साल में की तुलना में वर्तमान में हिंदी साहित्य की दुर्गती ज्यादा दुर्गति हुई है।

साहित्य में हिंदी भाषा कहां तक पिछड़ गई है?
इसका सटीक अंदाजा लगाना तो मुश्किल है लेकिन कहा जा सकता है कि साहित्य के महत्व घटने के साथ ही हिंदी भाषा का भी महत्व घटा है। एक ओर जहां हिंदी साहित्य के लगातार पिछड़ने में अंग्रेजी को अत्याधिक महत्व दिया जाना जिम्मेदार है तो दूसरी ओर क्षेत्रीय भाषाओं का महत्व धीरे-धीरे बढ़ता हुआ देखने को मिल रहा है। कन्नड़, तमिल, मराठी सहित कई क्षेत्रीय भाषाओं में लेखक सक्रिय हुए हैं। क्षेत्रीय भाषाओं के साहित्य में लोग अब रुचि दिखाने लगे हैं। पिछले कुछ सालों में इसमें ज्यादा नहीं लेकिन साहित्य में क्षेत्रीय भाषाओं का महत्व बढ़ा है।
हिंदी साहित्य का महत्व क्यों घट रहा है?
एक ओर अंग्रेजी के प्रभाव से तो दूसरी ओर अनभिज्ञता से। देश की नई पीढ़ी को नहीं पता कि हिंदी साहित्य में कितना बड़ा ज्ञान भंडार छिपा है। इसमें सरकार भी कहीं न कहीं जिम्मेदार हैं। दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी को ही ले लीजिए। दिल्ली पब्लिक साइब्रेरियों में इतना पुराना साहित्य भरा है लेकिन अभी तक दिल्ली में रहने वाले युवा ही इसे नहीं जान पाए और न ही  सरकार ने ही इसे प्रचारित करने की जहमत उठाई।
सोशल मीडिया साहित्य जगत पर क्या प्रभाव डाल रहा है?
देखिए यह कहने में कोई गुरेज नहीं है कि सोशल मीडिया ने हर व्यक्ति को अपने अनुभव को व्यक्त करने का प्लेटफॉर्म दिया है। इससे कुंठाएं कम हुई हैं। जहां तक साहित्य पर पड़ते इसके प्रभाव की बात है तो कहा जा सकता है कि सोशल मीडिया एक बदलती दुनिया उदाहरण है, लोगों की रुचि बदल रही है पहले लोग अपने अनुभव किताबों में ही लिख पाते थे लेकिन अब सोशल मीडिया पर भी लिख रहे हैं।
सोशल मीडिया पर लिखने वालों पर हमले हुए, कार्रवाई हुईं, इसको कैसे देखते हैं?

निंदनीय है ऐसे हमले और कार्रवाई। सोशल मीडिया पर लिखने वालों की भावनाओं का सम्मान होना चाहिए। इस पर हो रहीं आलोचनाओं को सकारात्मक लेना चाहिए। सुधार की गुंजाइश हो तो करना चाहिए। वैसे लिखने की आजादी के नाम पर किसी के खिलाफ अभद्र भाषा का इस्तेमाल नहीं है।

वर्तमान किस तरह के साहित्य की मांग कर रहा है?

लोगों की रुचियां लगातार बदली हैं। कभी भी कोई व्यक्ति एक चीज को पसंद नहीं करता। उसकी रुचि में परिवर्तन आना स्वभाविक है। आज लोग वही पढ़ना चाह रहे हैं जिसमें उनकी रुचि है या जो वह पसंद करते हैं। उन्हें इससे कोई मतलब नहीं कि कौन सा साहित्य क्लालिटी वाला हो सकता है और कौन सा नहीं।

Thursday, January 15, 2015

विदर्भ या सुविधा?


क्या छोटे राज्यों में विकास छिपा है। अब महाराष्ट्र को दो राज्यों में बांटने की राजनीति हो रही है। क्या बिना बांटे विकास नहीं हो सकता। विदर्भ क्षेत्र के गांवों के किसान आज भी उपेक्षित हैं। विदर्भ क्षेत्र से मेरे मित्र अक्षय बुंद्रे से बातचीत के दौरान सामने आया कि विदर्भ में किसानों की हालत इतनी बद्तर होने लगी है कि लोग अपने पुरखों से चली आ रही किसानी को त्याग रहे हैं। किसान परिवार की अगली पीढ़ियां बड़े और चमकते शहरों की ओर अपनी रोजी-रोटी के लिए पलायन करने के लिए तैयार हैं और कितनों ने कर भी दिया है। 

 
महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र में 11 जिले आते हैं। इनमें से नागपुर को ही सबसे ज्यादा विकसित जिला बताया जाता है। ऐसी खबरें हैं कि अगर विदर्भ राज्य बनाने की राजनीति अपने मंसूबों में कामयाब हुई तो नागपुर को विदर्भ की राजधानी बनाया जाएगा। विदर्भ के नाम पर राजनीति करने वाले धड़े मान रहे हैं कि नागपुर राजधानी बनकर अपना पहले जैसा सम्मान पाएगा। दरअसल, नागपुर 1851 से 1861 तक नागपुर प्रांत और इसके बाद 1950 तक मध्य प्रांत और बरार संभाग यानी नागपुर और अमरावति डिवीजन की राजधानी रहा है।


विदर्भ क्षेत्र में आने वाले ग्यारह जिलों के ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले किसान औऱ गरीब परिवार दरिद्रता का जीवन जी रहे हैं। वहां के रहने वाले बताते हैं कि नागपुर जिले को छोड़कर ज्यादातर वहां न बिजली पहुंच पाती है और न ही अन्य सुविधाएं।


सुविधाओं से वंचित विदर्भ के परिवारों की समस्या का अंदाजा इस बात लगाया जा सकता है कि महाराष्ट्र में विदर्भ क्षेत्र में रहने वाले किसानों ने अपनी इसी माली हालत के चलते आत्महत्या की है। एक अनुमान के मुताबिक पिछले एक दशक में महाराष्ट्र राज्य में करीब दो लाख किसानों ने आत्महत्या की है जिसमें से 70 फीसदी आत्महत्या करने वाले किसान विदर्भ क्षेत्र में रहने वाले थे।

बेमौसम बरसात और तापमान खराब होने वाली फसल की लागत वसूलने लायक भी सरकार की ओर से सहायता नहीं मिल पाती।

महाराष्ट्र के गांव से बहुत दूर बेंगलुरू में इंजीनियरिंग क्षेत्र में नौकरी करने आए अक्षय बुंद्रे विदर्भ के किसान परिवार से हैं। बॉंद्रे के मुताबिक वह किसानी करना चाहते थे लेकिन क्षेत्र में असुविधाओं की वजह से सभी लोग अपना मुख्य कार्य छोड़कर विकल्प तलाशने में जुट गए हैं। विदर्भ में आने वाले शहरी क्षेत्र को छोड़कर गांवों में बिजली आपूर्ति की समस्या भी एक बड़ी समस्या है।

जबकि पूरे राज्य में सप्लाई होने वाली कुल बिजली का करीब 67 फीसदी हिस्सा विदर्भ क्षेत्र से आता है।

विदर्भ में जो बिजली प्लांट हैं उससे विदर्भ के ही किसान परिवारों को बिजली नहीं मिल पाती। किसान की रात अंधेरे में तो दिन तपती धूप में अपनी फसल की सिंचाई करने में बीत जाता है। सिंचाई करने की आधुनिक मशीने भी अगर किसान खरीदे तो बिना बिजली वह असहाय ही महसूस करेगा। विदर्भ के हिस्से की सुविधा महाराष्ट्र शहरी क्षेत्रों तक सिमट कर रह जाती है। शायद यही वजह है कि विदर्भ के लोग अपने आपको उपेक्षित महसूस करने लगे हैं। इस तरह के भेदभाव का भाव असुविधाओं और सुविधाओं के बीच के लम्बे अंतराल के बाद ही उत्पन्न होता है।

अब सोचने की यह जरूरत है कि महाराष्ट्र के लोगों को क्या चाहिए दो छोटे राज्य या सुविधाएं

पंचायत संदेश- कॉलम कड़वी हकीकत में प्रकाशित लेख। 

 

Saturday, November 15, 2014

ग्रामीण विकास का अधूरापन


19 फरवरी सन 1900 को जन्में बलवंत राय मेहता ने अपनी आखरी सांस 19 सितंबर 1965 को ली थी। 1965 में पाकिस्तान-भारत के युद्ध के दौरान करीब तीन हजार किलोमीटर की ऊंचाई पर उड़ रहे जिस भारतीय विमान पर पाकिस्तान की ओर से हमला किया गया उसमें गुजरात के तत्कालानी मुख्यमंत्री बलवंत राय मेहता भी थे। तब मानों उनके साथ ही ग्रामीण विकास का सपना
भी दम तोड़ गया था। जिसका स्पष्ट उदाहरण है कि 21वीं सदी के इस दौर में भी ग्रामीण विकास का सपना अधूरा सा है।
ग्रामीण क्षेत्रों तक सरकारी योजनाओं का लाभ सीधे बिना किसी रुकावट के पहुंच जाए इसके लिए 1957 में बलवंत राय मेहता की अध्यक्षता में समिति गठित समिति ने जो सिफारिशों के आधार पर ग्राम पंचायत व्यवस्था लागू की। वह ये सोचकर लागू हुई की समाज कल्याण से जुड़ी विभिन्न योजनाओं के तहत जारी वित्तीय सहायता सही तरीके से इस्तेमाल हो पाए और लाभ जरूरतमंद तक पहुंच पाए। लेकिन फिर भी व्यवस्था चरमरा रही है। 

वर्तमान परिदृश्य में ग्रामीण क्षेत्र में रोजागार के साधन नहीं हैं, शिक्षा नहीं है। इसके अलावा कृषि आधारित गांवों का विकास नहीं हो पाया। अशिक्षा, बेरोजगारी, स्वास्थ्य, जलापूर्ति में कमी, बिजली संकट का दंश ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले लोग अब तक झेल रहे हैं।

आइए ग्राम पंचायत की ऊपरी तौर पर दिखाई दे रहीं खामियों पर नजर डाल लेते हैं। उदाहरण के तौर पर ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम को ही ले लीजिए। वर्तमान में इसके तहत बेरोजगारी मिटाने के लिए सौ दिन का रोजगार दिया जाना अनिवार्य है।

ग्रामीण क्षेत्रों में इस योजना का लाभ जरूरतमंद तक ग्राम पंचायत के जरिए पहुंचाया जाता है। इसका जिम्मा ग्राम पंचायत के ही हाथ में है कि वह जरूरतमंद की पहचान करे और योजना का लाभ उस तक पहुंचाए। लेकिन थोड़ी गहराई से पड़ताल करें तो हो पता चल जाएगा कि सभी कुछ विपरीत घट रहा है। नरेगा में गरीब ग्रामीणों को सौ दिन के रोजगार के रूप में जो पैसा मिलना था उसकी बंदर बांट मची है।
गौरतलब है कि 2 सितंबर, 1959 के दिन बलवंत राय मेहता समिति की सिफारिशों के बाद सबसे पहले देश में राजस्थान राज्य में ही ग्राम पंचायत समिति का उद्घाटन किया गया था। इसलिए वहीं का एक उदाहरण पूरी तस्वीर को साफ करने के लिए काफी है।
हाल ही 20 अप्रेल-2014 को सीआईडी एसएचओ, हेडमास्टर भी नरेगा में मजदूर शीर्षक से दैनिक भास्कर में प्रकाशित समाचार में इस बात का खुलासा हुआ कि ग्राम पंचायत के तहत हुए घोटाले में पुलिस अधिकारी शिक्षक से लेकर वनाधिकारियों के भी जॉब कार्ड बना दिए गए। यानी जिन गरीब बेरोजगारों को मेहनताना मिलना चाहिए था उनको नहीं मिल पाया।

खैर यह तो उदाहरण भर है। इससे कहीं ज्यादा आए दिन नरेगा से जुड़ी पोल पट्टियां लगातार खुल रही हैं। इसका एक कारण ग्राम पंचायत के काम-काज में पारदर्शिता बनाए रखने के के लिए कोई विशेष पहल नहीं होना है।
इसी वजह से विकेंद्रीकरण कर पंचायत समिति व्यवस्था की आलोचना हो रही है।

इस पर कई लोग इस तरह की पंचायतराज व्यवस्था को समाप्त करने की हिमायती करते भी देखे जा सकते हैं। लेकिन इस ओर सोचने की जरूरत है कि व्यवस्था लागू करना, फिर असफल होने पर उसको खत्म करके कोई दूसरी व्यवस्था या योजना लागू करने में ही सरकारी तंत्रों की ऊर्जा खपाना कहां तक जायज है।
दरअसल, आजादी के बाद महात्मा गांधी ने ग्रामीण क्षेत्र में विकास के लिए पंचायतराज व्यवस्था की ओर जोर दिया था। महात्मा गांधी की जोर आजमाइश पर 2 अक्टूबर, 1952  को समुदायिक विकास कार्यक्रम चलाए गए। इन कार्यक्रम से परिणाम नहीं आने पर इसे समाप्त कर दिया। फिर, इसके स्थान पर 1953 में राष्ट्रीय प्रसार सेवा को प्रारंभ किया गया।

लेकिन इससे भी ग्रामीण विकास की गाड़ी आगे नहीं बढ़ पाई। जिसके बाद 1957 में बलवंत राय मेहता की अध्यक्षता में गठित की गई ग्रामोद्धार समिति की ओर से दी गईं सिफारिशों को लागू करते हुए पंचायत समितियों बनाई गईं थीं। अब अगर इसे भी समाप्त करने की ओर बढ़ा जाए तो यह व्यवहारिक रूप से सही नहीं होगा।
इसलिए जरूरत इस बात की नहीं कि ग्रामीण विकास से जुड़ीं व्यवस्थाएं व स्थापित प्रणालियां या कहें योजनाएं असफल हो गई हैं तो उन्हें समाप्त कर दिया जाए। जरूरत तो बल्कि इस बात की ओर गहराई से सोचने और अमल में लाने की है कि यह ग्रामीण विकास के लक्ष्य को पाने के लिए प्रणालियां या व्यवस्थाओं की असफलताओं की असल वजह क्या है।

इसी तरह पंचायततराज व्यवस्था के तहत गठित पंचायत समितियों में भ्रष्टाचार से जुड़ी जो खामियां निकल कर आ रही हैं उनको दूर करे बिना जरूरतमंद तक लाभ नहीं पहुंचया जा सकता। यह समस्या तभी पूरी तरह से दूर हो सकती है जब कड़ी निगरानी के तहत काम-काज का निपटारा हो पाए।
 
    
वैसे ग्रामीण विकास के लक्ष्य तक न पहुंच पाने में मुख्य तौर पर दो समस्याएं काम कर रही हैं। एक, पारदर्शिता न होना, दूसरी, पंचायत समितियों के जरिए किए जा रहे विकास कार्यों की निगरानी के लिए गठित की गई जिला ग्रामीण विकास एजेंसी के तहत नियुक्त सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों की काम करने व वित्तीय लेखे जोखे की निगरानी करने के लिए इच्छा शक्ति में कमी।

वहीं ग्रामीण क्षेत्र में स्वास्थ्य कल्याण के लिए प्रमुखता से कदम उठाए जाने की दरकार है। हालांकि मेडिकल कॉलेजों में दाखिला लेने के लिए संयुक्त परीक्षा पास कर डॉक्टर की डिग्री हासिल करने वाले युवा चिकित्सकों को ग्रामीण क्षेत्रों में चिकित्सकीय सेवा देना अनिवार्य कर देना एक अच्छी पहल कही जा सकती है। लेकिन इससे ज्यादा और भी प्रयास होने चाहिए। क्योंकि गांवों में जाकर सेवा करने के लिए युवाओं अंदर इच्छा शक्ति की कमी इस तरह के प्रयासों पर पानी फेर सकती है।
ग्रामीण विकास में सहयोग करने के लिए भावी पीढ़ी भी रुचि नहीं दिखा रही है। जिस तेजी से सरकार का ध्यान और विकास कार्य ग्रामीण क्षेत्रों से दूर होते चले गए उतनी ही तेजी से हमारी युवा पौध में ग्रामीण क्षेत्रों के प्रति लगाव लगातार घटा है। इसको गहराई से समझने के लिए ज्यादा गहराई में नहीं जाउंगा। अभी हाल की एक खबर ले लीजिए।

6 सितंबर-2014 को राष्ट्रीय अखबार राजस्थान पत्रिका में प्रकाशित समाचार में बताया गया कि मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश के लिए राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित परीक्षा में उत्तीर्ण होने वाले कई छात्रों ने मेडिकल कॉलेज में प्रवेश लेने से इस आधार पर मना कर दिया कि उन्हें कोर्स पूरा करने के बाद अनिवार्य रूप से बतौर डॉक्टर सबसे पहले ग्रामीण क्षेत्रों में सेवा करनी पड़ेगी। इन छात्रों ने बेंगलोर मेडिकल कॉलेज एंड रिसर्च इंस्टीट्यूट में दाखिला ले लिया। दरअसल, इन छात्रों ने ऐसा इसलिए किया क्योंकि कर्नाटक राज्य में केंद्रीय स्तर पर लागू ग्रामीण क्षेत्र में सेवा करने वाली शर्त कर्नाटक राज्य के इस कॉलेज में लागू नहीं होती।  

पारदर्शिता और पंचायत स्तर की निगरानी कर भ्रष्टाचार पर रोक लगाने के अलावा ग्रामीण विकास को तेजी से आगे बढ़ाने के लिए युवाओं में रुचि जगाने के कार्यक्रम भी चलाने की पहल होनी चाहिए। क्योंकि स्वास्थ्य सेवा ग्रामीण क्षेत्रों तक नहीं पहुंच पा रही है। अगर चिकित्सा व शिक्षा के क्षेत्र में आने वाले नए युवाओं को इस ओर प्रेरित किया जाए तो इससे भी काफी हद तक ग्रामीण विकास के लक्ष्य पाने के रास्ते खुल सकते हैं। 

(दिल्ली से 'पंचायत संदेश' पत्रिका के अंक में प्रकाशित लेख। राजस्थान में पत्रकारिता के दौरान ग्रामीण विकास के बारे में उभरी मेरी समझ के दो साल बाद पंचायतराज व्यवस्था जैसे गंभीर मुद्दे पर अपनी कलम को चला पाया हूं। आलोचनाओं और सुझावों का सम्मान के साथ स्वागत)