Monday, March 30, 2015

बदलते दौर में दलित बनती 'हिंदी'



ग्लोबलाइजेशन के दौर में भारतीय समाज कितना बदल गया है इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि वह खुद की भाषा पर तवज्जों देना ही भूलता जा रहा है। कुछ अंग्रेजी तो कुछ सोशल मीडिया और तेजी से बदल रही रूचियों के कारण हिंदी साहित्य एक पिछड़ रहे दलित की तरह है। हिंदी के पिछड़ेपन, साहित्य के घटते महत्व तथा बोलने-लिखने की आजादी को लेकर लेखक व वरिष्ठ पत्रकार शरद दत्त से संक्षिप्त बातचीतः




साहित्य से युवा, क्यों दूर हो रहा है, इसकी क्या वजह हैं?
युवा, हिंदी और अंग्रेजी दोनों साहित्य से दूर हो रहा है। लेकिन इस कशमकश में हिंदी साहित्य ज्यादा ही कुछ पिछड़ रहा है। इसकी वजह दो हो सकती हैं एक तो हम साहित्य की किताबों के लिए अच्छी कीमत का निर्धारण नहीं कर पा रहे हैं। आप ही बताइए अगर अच्छा साहित्य बाजार में ऊंचे दामों पर बिकेगा तो युवा कैसे उसे खरीदेगा।
इसकी दूसरी यह भी वजह है कि अब पब्लिक लाइब्रेरियों के प्रचार-प्रसार और उनसे युवाओं को जोड़ने के अभियानों में कमी आई है। पहले पब्लिक लाइब्रेरियां पढ़ने वालों की संख्या से भरीं रहती थीं लेकिन आज पब्लिक लाइब्रेरियों में सन्नाटा पसरा रहता है। पिछले 20 साल में की तुलना में वर्तमान में हिंदी साहित्य की दुर्गती ज्यादा दुर्गति हुई है।

साहित्य में हिंदी भाषा कहां तक पिछड़ गई है?
इसका सटीक अंदाजा लगाना तो मुश्किल है लेकिन कहा जा सकता है कि साहित्य के महत्व घटने के साथ ही हिंदी भाषा का भी महत्व घटा है। एक ओर जहां हिंदी साहित्य के लगातार पिछड़ने में अंग्रेजी को अत्याधिक महत्व दिया जाना जिम्मेदार है तो दूसरी ओर क्षेत्रीय भाषाओं का महत्व धीरे-धीरे बढ़ता हुआ देखने को मिल रहा है। कन्नड़, तमिल, मराठी सहित कई क्षेत्रीय भाषाओं में लेखक सक्रिय हुए हैं। क्षेत्रीय भाषाओं के साहित्य में लोग अब रुचि दिखाने लगे हैं। पिछले कुछ सालों में इसमें ज्यादा नहीं लेकिन साहित्य में क्षेत्रीय भाषाओं का महत्व बढ़ा है।
हिंदी साहित्य का महत्व क्यों घट रहा है?
एक ओर अंग्रेजी के प्रभाव से तो दूसरी ओर अनभिज्ञता से। देश की नई पीढ़ी को नहीं पता कि हिंदी साहित्य में कितना बड़ा ज्ञान भंडार छिपा है। इसमें सरकार भी कहीं न कहीं जिम्मेदार हैं। दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी को ही ले लीजिए। दिल्ली पब्लिक साइब्रेरियों में इतना पुराना साहित्य भरा है लेकिन अभी तक दिल्ली में रहने वाले युवा ही इसे नहीं जान पाए और न ही  सरकार ने ही इसे प्रचारित करने की जहमत उठाई।
सोशल मीडिया साहित्य जगत पर क्या प्रभाव डाल रहा है?
देखिए यह कहने में कोई गुरेज नहीं है कि सोशल मीडिया ने हर व्यक्ति को अपने अनुभव को व्यक्त करने का प्लेटफॉर्म दिया है। इससे कुंठाएं कम हुई हैं। जहां तक साहित्य पर पड़ते इसके प्रभाव की बात है तो कहा जा सकता है कि सोशल मीडिया एक बदलती दुनिया उदाहरण है, लोगों की रुचि बदल रही है पहले लोग अपने अनुभव किताबों में ही लिख पाते थे लेकिन अब सोशल मीडिया पर भी लिख रहे हैं।
सोशल मीडिया पर लिखने वालों पर हमले हुए, कार्रवाई हुईं, इसको कैसे देखते हैं?

निंदनीय है ऐसे हमले और कार्रवाई। सोशल मीडिया पर लिखने वालों की भावनाओं का सम्मान होना चाहिए। इस पर हो रहीं आलोचनाओं को सकारात्मक लेना चाहिए। सुधार की गुंजाइश हो तो करना चाहिए। वैसे लिखने की आजादी के नाम पर किसी के खिलाफ अभद्र भाषा का इस्तेमाल नहीं है।

वर्तमान किस तरह के साहित्य की मांग कर रहा है?

लोगों की रुचियां लगातार बदली हैं। कभी भी कोई व्यक्ति एक चीज को पसंद नहीं करता। उसकी रुचि में परिवर्तन आना स्वभाविक है। आज लोग वही पढ़ना चाह रहे हैं जिसमें उनकी रुचि है या जो वह पसंद करते हैं। उन्हें इससे कोई मतलब नहीं कि कौन सा साहित्य क्लालिटी वाला हो सकता है और कौन सा नहीं।

Thursday, January 15, 2015

विदर्भ या सुविधा?


क्या छोटे राज्यों में विकास छिपा है। अब महाराष्ट्र को दो राज्यों में बांटने की राजनीति हो रही है। क्या बिना बांटे विकास नहीं हो सकता। विदर्भ क्षेत्र के गांवों के किसान आज भी उपेक्षित हैं। विदर्भ क्षेत्र से मेरे मित्र अक्षय बुंद्रे से बातचीत के दौरान सामने आया कि विदर्भ में किसानों की हालत इतनी बद्तर होने लगी है कि लोग अपने पुरखों से चली आ रही किसानी को त्याग रहे हैं। किसान परिवार की अगली पीढ़ियां बड़े और चमकते शहरों की ओर अपनी रोजी-रोटी के लिए पलायन करने के लिए तैयार हैं और कितनों ने कर भी दिया है। 

 
महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र में 11 जिले आते हैं। इनमें से नागपुर को ही सबसे ज्यादा विकसित जिला बताया जाता है। ऐसी खबरें हैं कि अगर विदर्भ राज्य बनाने की राजनीति अपने मंसूबों में कामयाब हुई तो नागपुर को विदर्भ की राजधानी बनाया जाएगा। विदर्भ के नाम पर राजनीति करने वाले धड़े मान रहे हैं कि नागपुर राजधानी बनकर अपना पहले जैसा सम्मान पाएगा। दरअसल, नागपुर 1851 से 1861 तक नागपुर प्रांत और इसके बाद 1950 तक मध्य प्रांत और बरार संभाग यानी नागपुर और अमरावति डिवीजन की राजधानी रहा है।


विदर्भ क्षेत्र में आने वाले ग्यारह जिलों के ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले किसान औऱ गरीब परिवार दरिद्रता का जीवन जी रहे हैं। वहां के रहने वाले बताते हैं कि नागपुर जिले को छोड़कर ज्यादातर वहां न बिजली पहुंच पाती है और न ही अन्य सुविधाएं।


सुविधाओं से वंचित विदर्भ के परिवारों की समस्या का अंदाजा इस बात लगाया जा सकता है कि महाराष्ट्र में विदर्भ क्षेत्र में रहने वाले किसानों ने अपनी इसी माली हालत के चलते आत्महत्या की है। एक अनुमान के मुताबिक पिछले एक दशक में महाराष्ट्र राज्य में करीब दो लाख किसानों ने आत्महत्या की है जिसमें से 70 फीसदी आत्महत्या करने वाले किसान विदर्भ क्षेत्र में रहने वाले थे।

बेमौसम बरसात और तापमान खराब होने वाली फसल की लागत वसूलने लायक भी सरकार की ओर से सहायता नहीं मिल पाती।

महाराष्ट्र के गांव से बहुत दूर बेंगलुरू में इंजीनियरिंग क्षेत्र में नौकरी करने आए अक्षय बुंद्रे विदर्भ के किसान परिवार से हैं। बॉंद्रे के मुताबिक वह किसानी करना चाहते थे लेकिन क्षेत्र में असुविधाओं की वजह से सभी लोग अपना मुख्य कार्य छोड़कर विकल्प तलाशने में जुट गए हैं। विदर्भ में आने वाले शहरी क्षेत्र को छोड़कर गांवों में बिजली आपूर्ति की समस्या भी एक बड़ी समस्या है।

जबकि पूरे राज्य में सप्लाई होने वाली कुल बिजली का करीब 67 फीसदी हिस्सा विदर्भ क्षेत्र से आता है।

विदर्भ में जो बिजली प्लांट हैं उससे विदर्भ के ही किसान परिवारों को बिजली नहीं मिल पाती। किसान की रात अंधेरे में तो दिन तपती धूप में अपनी फसल की सिंचाई करने में बीत जाता है। सिंचाई करने की आधुनिक मशीने भी अगर किसान खरीदे तो बिना बिजली वह असहाय ही महसूस करेगा। विदर्भ के हिस्से की सुविधा महाराष्ट्र शहरी क्षेत्रों तक सिमट कर रह जाती है। शायद यही वजह है कि विदर्भ के लोग अपने आपको उपेक्षित महसूस करने लगे हैं। इस तरह के भेदभाव का भाव असुविधाओं और सुविधाओं के बीच के लम्बे अंतराल के बाद ही उत्पन्न होता है।

अब सोचने की यह जरूरत है कि महाराष्ट्र के लोगों को क्या चाहिए दो छोटे राज्य या सुविधाएं

पंचायत संदेश- कॉलम कड़वी हकीकत में प्रकाशित लेख।