Friday, April 25, 2014

सांस्कृतिक दूरियां




एक राज्य के लोग दूसरे राज्य से आने वाले लोगों से नफरत करने लगे हैं, कोई साउथ से आता है तो मेट्रो सिटी में रहने वाले लोगों को चिढ़ होती है, बिहार से आता है तो उससे सीधे से बात करने से पहले ही बिहारी कह-कहकर जलील किया जाता है। उत्तर-प्रदेश से महाराष्ट्र में जाने वाले कई लोगों को इसी अजीब सी स्थिति से गुजरना पड़ता है। इससे एक अलग-अलग राज्यों की संस्कृतियों के बीच की दूरी एक बड़ी खाई में दब्दील हो रही है। शायद यह इसलिए भी है क्योंकि वर्तमान के प्रतियोगी दौर से अंधाधुंध गुजर रहे समाज को एक दूसरे से बात करने तक की फुरसत नहीं है। लोग अपने पड़ोस में ही रहने वाले लोगों से बात नहीं करते, दूसरे राज्यों से आने वाले लोगों को तो समझना दूर है। यहां तक कि इस भाग रहे जीवन में अपने परिवार के सदस्यों को भी समय नहीं दे पा रहे हैं जिससे आपसी मेल-मिलाप व एक दूसरे को समझने की क्षमता घट रही है। 
 अभिषेक वर्मन द्वारा निर्देशित फिल्म 2 स्टे्टस देखी, जिसमें देश में सांस्कृतिक समझ के कम होते रहने से उपज रही सांस्कृतिक दूरियां दिखाई गई है। अभिनेता अर्जुन कपूर ने मेट्रो सिटी में रहने वाले अपने ही कल्चर के दायरे में सिमटे परिवार के बेटे की भूमिका बखूबी निभाई है वहीं अलिया भट्ट दक्षिण भारतीय उच्च शिक्षित व विभिन्न संस्कृतियों से अनभिज्ञ रहने वाले परिवार की बेटी के रूप में नजर आईं। कहानी की शुरूआत वाकई व्यवहारिक लगती है। अर्जुन कपूर व अलिया भट्ट आईआईएम अहमदाबाद में एमबीए करने के दौरान मिलते है। वहां दोनों को प्यार होता है, दोनो शादी करना चाहते हैं, दोनों अपने-अपने माता-पिता को मिलवाना चाहते हैं लेकिन पहली मुलाकात में दोनों के परिवार एक दूसरे की संस्कृतियों को न समझते हुए हिचकते हुए बात ही नहीं कर पाते। जिसके बाद दोनों के परिवार के मन में पूर्वाग्रह जन्म लेता है। वहीं एक तरफ क्रिष (अर्जुन कपूर) की मां (अर्मिता सिंह) दहेज के रूप में अपनी महत्वकांशा पूरी करने का ख्वाब भी सजा लेती हैं और इन सब के बीच क्रिष (अर्जुन कपूर) के पियक्कड़ पिता का किरदार अदा कर रहे रोनित रॉय भी अपने बेटे की भावनाओं को नहीं समझ पाते हैं। 
 इसी तरह अनन्या (अलिया भट्ट) अपने माता-पिता को मनाने की कोशिश करती है लेकिन पिता (शिवकुमार) व मां (राधा स्वामिनाथन) पूर्वाग्रह में उलझे रहते हैं और अपनी बेटी की भावनाओं को समझ नहीं पाते। कोशिश करने के बावजूद कुछ नहीं हो पाता, रिश्ता टूट जाता है। हालाकि वास्तविक जीवन से हटकर फिल्म का अंत सुखद दिखाया गया। दोनो परिवार एक दूसरे की संस्कृति को जनते हैं और बातचीत कर सांस्कृतिक दूरियां मिटा लेते हैं। देश का समाज प्रतियिगता के चक्कर में अलग-थलग पड़ता जा रहा है। फिल्म की तरह सुखद रिश्ते स्थापित करने के लिए समाज के हर वर्ग को एक दूसरे सांस्कृति को मान देना होगा।

Friday, March 21, 2014

'मेरे पाप लाल थे'



'जब मेरी मृत्यु होगी तो यह आशा करता हूं कि ये कहा जा सकता है- उसके पाप भले ही लाल थे लेकिन उसकी किताबें पढ़ी गईं'

 राजस्थान के मेवात क्षेत्र में चारो ओर से काले पथरीले पहाड़ों से घिरे अलवर जिले में तमतमाती हुई सड़ी गर्मी के बाद ठण्ड का अहसास होने लगा था। सितबंर का महीना चल रहा था। एक रोज़ खबर खोजने के लिए स्टेशन पर घूम रहा था तो अचानक बुक स्टॉल पर मेरी नजर पड़ी। मैं वहां पहुंचा और बुक स्टॉल के चाचा से अच्छी किताब दिखाने को कहा तो उन्होंने खुशवंत सिंह की लिखित एक पुस्तक देते हुए कहा कि- लो अच्छी पुस्तक। पुस्तक का शीर्षक था ‘औरत-सेक्स-लव और लस्ट’।
इत्तेफाक से वहां कोई सामाजिक व राजनीतिक चिंतन से जुड़ी गंभीर सी दिखने वाली पुस्तक नहीं थी तो मुझे खुशवंत सिंह की किताब को लेना पड़ा। इतने दिन से कुछ पढ़ जो नहीं पाया था। दफ्तर से लौटने के बाद कुछ इस तरह रात को कमरे पर पहली बार खुशवंत सिंह की किताब पढ़ी। इस पुस्तक में वैसे तो कई लेख हैं, जो औरत की सुंदरता, महिला पुरुष के बीच के आकर्षण पर आधारित है। लेकिन पहला लेख – ‘वह भिखारिन’ ने ज्यादा ही प्रभावित किया। इसमें उन्होने सड़क पर बैठी एक भिखारिन की सुंदरता का वर्णन अपने शब्दों में किया। उन्होंने इस लेख के जरिए यह संदेश फैलाने की कोशिश तो कम से कम की कि सुंदरता का कोई पैमाना नहीं हो सकता। अगर आपका नजरिया प्यार के तराजू पर सही उतरता है तो आपको सुंदरता एक भिखारिन में भी नजर आ सकती है, महलों में बैठी रानी और चारदिवारी से बने कच्चे-पक्के मकानों में पली बढ़ी औरतों में भी और जुग्गी बस्तियों में भी। 
यहां इस लेख में कुछ इस तरह का दृश्य का चित्रण हुआ है- 
"खुशवंत भिखारिन की ओर आकर्षित होते हैं और वह रोजाना भिखारिन को देखने उसी पानवाली दुकान पर पान खाने जाने लगते हैं जहां उस भिखारिन को उन्होंने पहली दफा देखा था। एक दिन जब पनवाड़ी के सामने वाली सड़क पर वही भिखारिन नहीं दिखाई दी तो खुशवंत ने पान खाते हुए दुकानवाले से पूछा कि वह भिखारिन कहां गई? जवाब मिला कि दो दलाल आए थे, उठाकर ले गए" 
इससे दो बातें सामने स्पष्ट होती हैं। पहली, समाज की वास्तविक प्रकृति और दूसरी, औरत के लिए आदमी के तीन रूप हैं एक जो देखता रहता, दूसरा प्यार करता है, तीसरा कष्ट पहुंचाता है।
हैरानी होती है यह बात सोचकर कि औरत की सुंदरता पर खुशवंत सिंह के लेखन की निंदा होती आई है। समाज के सामने कलम से अपने व्यक्तित्व का सच बयान करने वाले खुशवंत जैसे व्यक्तित्व की मुखालफत नहीं बल्कि तारीफ होने चाहिए। दरअसल अभिव्यक्ति का खुशवंत सिंह का यह तरीका कम से कम उन लोगों से तो अच्छा ही था जो अपनी दमित इच्छा की अभिव्यक्ति को औरत की इज्जत कुचल कर छेड़छाड़ या दुष्कर्म जैसे अपराध कर बैठते हैं।

 'जब मेरी मृत्यु होगी तो यह आशा करता हूं कि ये कहा जा सकता है- उसके पाप भले ही लाल थे लेकिन उसकी किताबें पढ़ी गईं' यह पंक्तियां फ्रांस के मशहूर लेखक हिलेरी बैलोक ने लिखी थीं। इन पंक्तियों को खुशवंत सिंह ने अपनी पुस्तक के परिचय में जगह दी, जो आज उनके व्यक्तित्व पर कही जा सकती हैं। इसका एक प्रमाण बुक स्टॉल वाले चाचा के उस वाक्य में छुपा है जो उन्होंने खुशवंत सिंह की पुस्तक मुझे देते हुए कहा था। कहा था कि 'ये लो अच्छी पुस्तक है'। इससे जाहिर है कि उस बुक स्टॉल पर अच्छी किताब का मतलब था कि निसंदेह वहां आने वाले पाठक खुशवंत सिंह की किताबें लेते होंगे। 

खुशवंत सिंह ने अपनी किताब की शुरूआत में उनके लेखन पर की गई एक टिप्पणी का जिक्र किया है। एक दिन एक शीर्षस्थ समचार पत्र के सम्पादक ने कहा था कि- 'आपने बुलशिट को भी एक आर्ट में बदल दिया है'। वाकई हमारे लेखक समाज से एक ऐसा महान व्यक्तित्व चला गया जिसकी कलम में वह ताकत थी जो सबकी नजरों में तुच्छ दिखने वाली किस्सों में भी रंग भर दे। 


खुसवंत सिंह ऐसे व्यक्तित्व के धनी थे कि उन्होंने तमाम आलोचनाओं को स्वीकार करते हुए यह माना कि उनका लेखन कई लोगों को पसंद भी आ सकता है और नहीं भी। उन्होंने इस सच्चाई को बयान करते हुए पुस्तक के परिचय में लिखा है कि- 'हालांकि एक पियक्कड़, औरतों के रसिया व गंदे बूढ़े आदमी के रूप में मेरा वर्णन किया जाता है, पर मेरे पास कुछ पाठक तो हैं ही'।

करीब पांच महीने बीत जाने के बाद 19 मार्च-2014 की रात को अचानक पुरानी पुस्तकों को देखते देखने के दौरान फिर से खुशवंत सिंह की यह पुस्तक बाहर निकाली थी। अपने पास ही बैठे अपने मित्र को इस किताब को भेंट करते हुए सुझाव दिया था कि यदि मन गंभीर चिंतन वाली किताबों से हटकर कुछ पढ़ना हो तो यह किताब जरूर पढ़ना। किसने सोचा था कि जिस किताब को पढ़ने के बाद भी पन्नों को 19 मार्च की रात पलटकर देख रहा था उसका लेखक 20 मार्च की सुबह तक अलविदा कह जाएगा।



 खुशवंत की याद में